Thursday, April 30, 2020

दूरदर्शन का एंटीना और हमारा बचपन पढ़िए तो जरा बड़ा मज़ा आएगा :: Doordarshan our Childhood

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दूरदर्शन और हमारा बचपन पढ़िए तो जरा बड़ा मज़ा आएगा 

दोस्तों दूरदर्शन का एक दौर लोगो ने वह भी देखा जब कुछ ही लोगो के पास टेलीविजन हुआ करता था कार्यक्रम को देखने की उत्सुकता थी लेकिन एंटीना ठीक करते करते आधा कार्यक्रम निकल जाता था , गुस्सा उस पर आता था जो सेट किया हुआ एंटीना हटा देता था , तब से लेकर आज में बहुत परिवर्तन हुआ समय बदला समय के साथ तकनीकी बदली लेकिन दूरदर्शन से हमारा प्यार वैसा ही बरकार रहा और हमेशा रहेगा ,आज जिस दूरदर्शन को हम देखते है पहले ये वैसा नही था ।15 सितंबर 1959 को सिर्फ प्रयोगात्मक रूप में भारत वर्ष में एक चमत्कार देखा गया ,विकिरण के माध्यम से दिल्ली से सिर्फ 20 किलोमीटर के दायरे में 20 टेलेविज़न के साथ लोगों ने पहला कार्यक्रम देखा यह लोगो केलिए एक नए चमत्कार जैसा था लेकिन भारत मे एक नई क्रांति का आगाज़ हो गया था , प्रयोगात्मक के तौर पे लोकसंगीत कार्यक्रम भरतनाट्यम का हर शुक्रवार को आधे घंटे के लिए प्रसारण किया गया , इसी प्रकार यह रेंज बढ़ा कर 20 से 40 और धीरी धीरे दिल्ली के अन्य राज्यों तक पहुची , 1965, 15 अगस्त को 5 मिनट्स का समाचार प्रसारित किया गया और इसी के साथ दूर संचार प्रणाली को बल मिला और 1970 आते आते कई कार्यक्रम लोगो की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए जिसमे किसानों के लिए कृषि दर्शन , भारतवर्ष के पहले टॉक शो फुल खिले है गुलशन गुलशन सबसे ज्यादा देखा जाने वाला कार्यक्रम बना जिसमे बहुत से फिल्मी सितारों को लोगो से रूबरू होने का मौका मिला और अपने पसंदीदा सितारों को सुनने का भी जिसकी संचालिका तबस्सुम जी थी , और इस के बाद चित्रहार यानी फिल्मी गानों का कार्यक्रम लोगो के होठो पर सजने लगा। 

समय निरंतर अपनी गति से बढ़ता जा रहा था और दूरदर्शन अपने यौवन की ओर बढ़ रहा था , धीरे धीरे 1970 से 1975 तक भारत के अन्य राज्यों तक दूरदर्शन पहुंचा और नए स्टेशनों की स्थापना हुई जैसे कोलकाता ,मुम्बई, लखनऊ , जालंधर आदि महानगरों में ।1982 को एशियाई खेलों की मेजबानी भारत को करनी थी और रंगीन दूरदर्शन को देश के सामने प्रदर्शित करने की चुनोती थी । दूरदर्शन के सभी कमर्चारियों और अधिकारियों के अथक प्रयासों से 15 अगस्त 1982 को भारत ने एक बार फिर एक नए चमत्कार को अपनी आंखों में धारण किया जब रंगीन प्रसारण का आगाज़ हुआ, दूरदर्शन के साथ ही सभी का जीवन मानो रंगीन हो गया , अब तो जो भी जैसा था जिस रंग का था वही देखा जाने लगा एक प्रकार से सभी की कल्पनाये सजीव रूप में सुंदर तरीके से प्रसारित की जाने लगी ।इस प्रकार टेलीविजन पर रंगीन युग का आरंभ हुआ एशियाई खेलों ने बढ़ चढ़ कर इसका प्रचार किया ।अगला साल 1983 का था भारत अपने नए कीर्तिमान गढ़ने की तैयारी कर रहा था , और तभी भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा को चंद पर जाने का मौका मिला ये सभी भारतीयों के लिए गर्व की बात थी लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि टेलीविजन देश की शान बन गया , तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राकेश शर्मा से अंतरिक्ष से सीधे बात की , उन्होंने सवाल किया कि आपको भारत ऊपर से कैसा दिखता है उनके जवाब ने सबका मन मोह लिया " सारे जहा से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" 

जब यह दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया तो देश अपनी उत्साह की चरम सीमा में पहुच गया सबने इसे सराहा किसी भी भारतीय के लिए ये गर्व की बात थी ।

1984 के चलते धारावाहिको ने हमारे जीने का तरीका बदल दिया 
वो भी क्या दौर था…जब टीवी का मतलब सिर्फ दूरदर्शन हुआ करता था। उस समय 24/7 टीवी नहीं आता था| पूरा दिन हम टकटकी लगाकर अपने पसंदीदा सीरियल्स का इंतज़ार करते थे और बच्चो हो या बड़े सभी को रविवार का कुछ ज्यादा ही बेसबरी से इंतजार होता था , रविवार का मतलब सुबह-सुबह बिना किसी के उठाये उठ जाना और फटाफट नहा कर टीवी के सामने बैठ जाना, ताकि कोई न आपको परेशान करे और ना ही डाट पड़े। 


“रंगोली” में शुरू में पुराने फिर नए गानों का लुफ्त उठाना , “जंगल-बुक” देखते समय उसके शुरूआती गाने को जोर जोर से गाना, “चंद्रकांता” को कास्टिंग से लेकर अंत तक देखना, और फिर उसके सस्पेंस में अगले हफ्ते तक खो-जाना , शक्तिमान के कारनामो के पुल ऐसे थे बांधते,
जैसे कि, हमारे पापा ही वो करतब थे दिखाते, शनिवार और रविवार की शाम को होता था फिल्मों का इंतजार, कोई नेता के मर जाये और सीरियल ना आये तो आजाता था घर में भूचाल अगर पिक्चर ना हो क्लियर तो खुद ही एंटीना घुमाते और फिर भी ना आये टीवी तो पडौसी के घर घुस जाते सचिन के आउट होते ही गुस्से में, टीवी से रिश्ते-नाते ही टूट जाते , खुद ही अपना बल्ला उठाकर दोस्तों के बीच दिल अपना बहलाते मूक बघिर के समाचार की नक़ल करना था बच्चो का खेल, चलो आज करवाते है हम आपकों फिर से इन किरदारों से मेल,

दूरदर्शन की पुरानी यादें 
कुछ पुराने किरदारों को आपके सामने रखने की एक कोशिश है , जो आपके बचपन की यादों में कही न कही जरुर बसे होंगे –

जंगल बुक(मोगली) – सभी बच्चों का पसंदीदा कार्टून रविवार के दिन की शुरुवात ही मोगली के साथ होती थी| मोगली को देखते हुए ही हम अपना सुबह का नाश्ता करते थे| उस समय का सबसे ज्यादा देखने वाला कार्टून था ये| मोगली का गाना आज भी कही सुनाई पड़ता है तो बचपन की याद ताजा हो जाती है| कैसे एक इन्सान का बच्चा जंगल में खूखार जानवरों के बीच रहता है ये देखना काफी रोमांचित होता था| भालू, बघीरा, अकडू-पकडू, चमेली, लीला ऐसे किरदार है जिन्हें हम कभी भी नहीं भुला सकते है|

रामायण – आज भी जब हम अपनी आँखे बंद करते है और भगवान राम की प्राथना करते है तो जो चेहरा हमारे सामने आता है वो है अरुण गोविल का।  अरुण जी इस किरदार में ऐसे रचे बसे की लोग इन्हें भगवन ही समझने लगे, इसे कहते है किरदार की लोकप्रियता।  उस समय की रामायण सीरीज ने जो ज्ञान हमे दिया वो आज की 100 रामायण सीरीज भी नहीं दे सकती। 

शक्तिमान – शक्तिमान का किरदार मुकेश खन्ना ने निभाया था| 90’s के दौर में ही हमे भारत का पहला superhero मिला| शक्तिमान ने TRP के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे| हर घर में सारे बच्चे दिन में 12 से 1 बीच अपनी कुर्सी से चिपक के बैठे रहते| ये सीरियल बहुत popular और लम्बे समय तक टीवी में प्रसारित होने वाला सीरियल रहा| सीरियल के अंत में “छोटी छोटी मगर मोटी बातें” शक्तिमान के द्वारा बताइ जाती थी| जिसे सारे बच्चे बड़े ध्यान से देखते और मानते भी थे|

चंद्रकांता – देवकी नंदन खत्री द्वारा लिखित उपन्यास चंद्रकांता दूरदर्र्शन में पहली बार 1994 में आया था| इसके किरदार के डायलॉग आज भी उतने ही मशहूर है जितना उस समय हुआ करते थे रविवार की सुबह रोमांच से भरे इस सीरियल को देखने का एक अलग ही अनुभव हुआ करता था| क्रूर सिंह अका याकू का किरदार नेगेटिव था फिर भी लोग उसके डायलॉग पहनावे को बहुत पसंद करते थे|

सुरभि – सुरभि एक बहुत ही लोकप्रिय सीरियल रहा है जिसे रेणुका शहाने और सिद्धार्थ काक मिल कर मेजबानी करते थे| दूरदर्शन में 1993 में पहली बार ये प्रसारित हुआ था। इस सीरियल के द्वारा हमे अपने भारत से जुड़े कुछ अनछुए तथ्य पता चलते थे| भारतीय संस्कृति को इस तरह से दिखाया गया की आज भी भूलना नामुमकिन है। इस सीरियल में साप्ताहिक क्विज होता था जिसमे 1 प्रश्न पुछा जाता था जिसका जबाब देने के लिए लोग 15 पैसे के पोस्टकार्ड को लाखो की तादाद में भेजते थे| लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स के अनुसार भारतीय इतिहास में इस सीरियल को सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया प्राप्त करने वाला सीरियल घोषित किया था। 

मालगुडी डेज – 1986 में 39 भाग का ये सीरियल दूरदर्शन में आता था बाद में इसे फिर से दूरदर्शन में ही प्रसारित किया गया था| 2006 में इसकी नयी कड़ी बनी थी जिसे दूरदर्शन में ही प्रसारित किया गया था| इसमें सभी कहानिया 1 भाग की ही होती थी।  स्वामि नाम के बालक के इर्द गिर्द घूमती कहानी कही न कही हमे अपना प्रतिबिम्ब दिखाती थी।

श्री कृष्णा एवं महाभारत – श्री कृष्णा श्रृंखला रामानंद सागर द्वारा लिखी गई एवं निर्मित हुई थी| जिसे 1993 में प्रसारित किया गया था|भगवान कृष्णा के बाल जीवन की कथाएं देख कर मन प्रफुल्लित हो उठता था। महाभारत हमारे देश की धरोहर B.R. चोपड़ा द्वारा निर्मित 1988 में दूरदर्शन में प्रसारित हुई थी। बहुत ही सहजत से चोपड़ा जी ने इतनी कठिन कहानी को प्रदिर्शित किया था। 

फौजी – फौजी एक ऐसा सीरियल था जिसमे हम भारतीय सेना के जवान की प्रतिदिन जिंदगी के बारे में जान पाते थे। इस सीरियल में बॉलीवुड के बादशाह कहे जाने वाले शाहरुख़ खान प्रमुख भूमिका में थे, उस पात्र का नाम था अभिमन्यू राय, ये सीरियल दूरदर्शन में 1988 में आया था। इसी सीरियल से शाहरुख़ खान ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुवात की थी। इस सीरियल के दौरान हम इंडियन आर्मी को करीब से जन पाए थे। 

सुपर मारिओ  – विडिओ गेम्स की दुनिया में सुपर मारिओ ऐसा गेम था जिसे आज भी कोई बच्चा नहीं भूल पाया| गर्मी की छुट्टियों में पापा वीडियो गेम ले कर आते थे। जिससे बच्चे धुप में ना जाये घर पे ही खेले। 90’s में पहली बार मारिओ गेम आया जिसे घर पर टीवी क सामने बैठ कर खेल सकते थे| इस समय और भी गेम्स आए किन्तु इसकी टक्कर का कोई न था| मारिओ खेलते-2 उसमे इतना खो जाते थे की खाने पिने की भी याद न रहे और मारिओ के मर जाने पे तो सारा घर सर पे उठा लेते थे। 

जब तक दूरदर्शन नही था रविवार हमारे लिए एक नीरस छुटकारे का दिन था, जिसमें स्कूल की झिकझिक तो नही थी पर बापू की खिटपिट जरूर थी। दूरदर्शन ने अपने आते ही रविवार के मतलब को बदल दिया। दूरदर्शन ने हमें रविवार को रोमियो होना सिखाया। हमने दूरदर्शन को देख-देख कभी राजकपूर की तरह प्यार किया कभी देवानन्द की तरह। हमने राजेश खन्ना के लिए आंसू बहाये तो ऋषिकपूर को गालियां दी। हमने धर्मेन्द्र को ईश्वर मान लिया और अमिताभ को उसका मुंशी।

हमने मिथुन की तरह टांग लचकाने की कोशिश की, कभी गोविंदा की तरह बाल बनाये, कभी रजनी की तरह सिगरेट उछाली। हम बिना मरे ही राजेन्द्र कुमार के साथ स्वर्ग चले गए। हमने दूरदर्शन की उंगली पकड़े राम के साथ चौदह वर्ष का वनवास काटा और मोगली के साथ बघीरा की पीठ पर बैठ चड्ढी पहनकर फूल खिलाये। हमने अर्जुन के अंतर्द्वन्द को कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े होकर जिया।

दूरदर्शन के साथ हमने मालगुड़ी के छोटे से कस्बे में “ता ना ना न ना” गुनगुनाना सीखा। दूरदर्शन ने हमें कभी द्वापर युग में पहुंचा दिया तो कभी त्रेता युग मे। दूरदर्शन के लिए हम कभी श्री 420 हुए, कभी व्योमकेश बख्शी, तो कभी लावारिस और जब बापू से दूरदर्शन से इस कदर प्रेम के लिए बेसुरे लहज़े में पिटे तो दूरदर्शन के सुर में चिल्लाये…”विशुम”

नितीश श्रीवास्तव
कायस्थ की कलम से
तो मित्रों ये थी दूरदर्शन से जुडी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी, जिसे मैंने आपसे साझा की। ऐसे ही रोचक और महत्वपूर्ण जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट पर निरंतर आते रहे और अपने दोस्तों ,परिवार वालों और सभी प्रियजनों तक भी ये महत्वपूर्ण जानकारी पहुचायें। धन्यवाद।




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