Wednesday, April 29, 2020

ठा० रोशन सिंह, लाहिड़ी जी और बिस्मिल जी के फांसी की सजा के दिन के मार्मिक वर्णन से आँखे भर जाती हैं :: The great freedom fighter

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ठा० रोशन सिंह, लाहिड़ी जी और बिस्मिल जी के फांसी की सजा के दिन के
मार्मिक वर्णन से आँखे भर जाती हैं 

सभी को सज़ा सुनाये जाने के एक दिन पहले सबने एक नाटक खेला जिसमे कुछ नकली जज बने कुछ नकली मुजरिम , नाटकीय अदालत जारी थी। नकली अदालत ने ठाकुर रोशन सिंह को सिर्फ 5 साल की ही सज़ा सुनाई इस पर ठाकुर रोशन सिंह बिगड़ गए अपनी सज़ा को हसी में न लेकर गुस्से में बोले, तुम लोग मुझे कम सज़ा क्यों सुना रहे हो तुम लोगो का बस चले तो मुझे छोड़ ही दो , इस पर श्री गोविंद चरण दा ने उन्हें समझते हुए कहा आप इन बच्चों पर बेकार ही बिगड़ रहे है वैसे सही पूछे तो सबूतों को देखते हुए हम सब समझते है कि आपको इससे ज्यादा सज़ा नही मिलेगी ,यह सुनकर ठाकुर साहब मायूस से हो गये ।

क्या दिल रहा होगा उनका क्या माहौल होगा कि हर कोई मरने को तैयार है , मरना तो मानो कोई खेल हो फांसी लगना जैसे सम्मान , क्या सोंच रही होगी मैं तो कभी सोच ही नही पाता।
उस रात वहां का हाल यह था कि जिस किसी साथी को औरों से कम सज़ा सुनाई जाती वह उसे अपना अपमान समझने लगता। वैसे ठाकुर साहब की तरह अन्य साथियों ने कुछ नही कहा परंतु कम सज़ा सुनने वाले दिल उदास अवश्य हो गये । वह रात बारह एक बजे तक इसी प्रकार एक दूसरे के भाग्य का फैसला करने में बीती। रात्रि सोने से पूर्व श्री राजेन्द्र नाथ लाहिडी साथियों से बोले "तुम लोग ठीक कहते हो मुझे आजीवन कारावास से तो कम सज़ा होगी ही नही साले फांसी भी दे सकते है उसके लिए मैं प्रस्तुत हूं।

आखिरकार 6 अप्रैल 1927 की सुबह हुई। सभी साथी स्नानादि प्रातः कालीन क्रियायों से जल्दी जल्दी निवृत हुए । उस रोज सभी साथियों के चेहरों पर अजीब गंभीरता थी । हर एक के हृदय में अजीब सी उथल पुथल हो सही थी । जीवन मरण के साथियों के बिछुड़ने का कितना गहरा दुख होता है इस बात का उन्हें अब अनुभव हो रहा था , पंडित रामप्रसाद बिस्मिल कट्टर आर्य समाजी थे अपना भोजन स्वयं अलग ही बनते थे लेकिन आज ये क्या , क्या पंडित क्या शाचिन दा क्या ठाकुर साहब क्या लाहड़ी सभी साथी अपना अपना भोजन थाल किये एक दूसरे को अपने हाथों से भोजन करा रहे थे , एक तरफ एक दूसरे के मुह में निवाला डाला जा रहा था साथ मे टप टप आंसू गिरते जाते थे । वह भोजन करना नही बल्कि एक प्रकार से आखिरी विदाई ली जा रही थी ।एक हृदय विदारक दृश्य था वहां का ,इसी बीच जेलर रॉय साहब चम्पालाल काकोरी बंदियों को लेने पहुंचे तो ग्यारह नंबर बैरक का दृश्य देख कर ठिठक पड़े और अपने आंसुओं को रोक न सके , इसके बाद तो किसी से भोजन न हो सका कुछ समय एक दूसरे से गले मिलने और क्षमा याचना करने में ही बीता।

सभी साथी जल्दी जल्दी अदालत जाने को तैयार होगये । इस ऐतिहासिक मुकद्दमे की चर्चा हर एक शख्स की जुबान पर थी आज उसी का फैसला होना था , इसीलिए इस अवसर पर लोगो की नवजवानों की भीड़ अधिक से अधिक होना स्वाभाविक था ।क्रांतिकारी अभियुक्तों का काफिला इस दिन नए रास्ते सदर वर्तमान में महात्मा गांधी मार्ग व राजभवन के सामने से होता हुआ रिंग थियेटर ले जाया गया , लारियों से उतरते ही सब सरहियों ने जोरदार नारे लगाकर आकाश गुंजा दिया । फिर सबने एक साथ तन्मय होकर जोश में एक गीत गाया जो आगे चलकर बहुत लोक प्रिय हुआ ---

"सर्फ़रोसी की तमन्ना अब हमारे दिल मे है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है"

क्रांतिकारियों को जोश और पूरी तन्मयता से यह गीत गाते देख वह उपस्थित सभी लोग दोनों तरफ लाइन लगाए चुपचाप सर झुकाये खड़े रहे।  बाहर पूरा गीत गाने के बाद दोबारा गीत गाते सीना ताने अदालत के कमरे में प्रवेश किया। जज हेमिल्टन आज अपने साथ एक और गाड़ी में अपना बोरिया बिस्तर बांधकर आये थे क्यों कि आज ही उन्हें लंदन वापस जाना था। हैमिल्टन ने अंग्रेजी में अपना फैसला सुनाया सबसे पहले राम प्रसाद बिस्मिल को धारा 121ए ,120 बी के अंतर्गत आजीवन कारावास तथा 396 के अंतर्गत मृत्यु दण्ड की सजा सुनाई डॉ ० राजेन्द्र लाहिड़ी को भी इन्ही धाराओं में मृत्य दण्ड की सज़ा सुनाई।

तीसरे नंबर पर ठाकुर रोशन सिंह को पहली दो धाराओं में 5 साल की सज़ा सुनाई और बाद में 396 में उन्हें भी फांसी की सज़ा सुनाई गई सभी आश्चर्य चकित थे। ठाकुर साहब अंग्रेजी के फाइव इयर्स का मतलब तो समझ गए थे, परंतु बाद में जज की कही बात जब उनके समझ मे नही आई तो बगल में खड़े साथी दुबलिश जी से पूछ बैठे की भाई जज बाद में क्या बक गया दरअसल ठाकुर साहब अंग्रेजी बिल्कुल नही जानते थे । डरते डरते दुंलिश जी ने बताया कि जज ने आपको भी फांसी की सज़ा सुनाई है इस पर ठाकुर साहब का चेहरा ऐसे खिल गया जैसे मानो गुलाब का फूल । वह झट से पलट और बिस्मिल की ओर मुझतिब होकर बोले " क्यों पंडित जी अकेले जाना चाहते थे, ठाकुर साहब का यह व्यवहार देख सबका दंग रह जाना स्वाभाविक था। दोस्तों ये जज्बा था हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का। 

जज के सज़ा सुनाकर चले जाने के बाद सभी साथियों ने जेल से लाये फूल आपस मे बाट लिए और एक एक कर मृत्यु दण्ड पाने वाले साथियों को प्रणाम कर उनके चरणों मे फूल चढ़ाए ,चिर विदा के इन क्षणों में उम्र और पद वरिष्ठता की सभी दीवारें ढह गई। शाचिन दा कर दा और सुरेश दा सरीखे ज्येष्ठ साथियों ने भी भाव विभोर होकर तीनों महाविभूतियों के चरण छुए । अदालत के कमरे में उपस्थित सभी बैरिस्टर वकील परिजन मित्रगण यह दृश्य देख नतमस्तक हो रो रहे थे । इस केस में रिहा होने वाले सर्व श्री शचीन्द्र नाथ विश्वास एवं हर गोविंद तो दहाड़े मार कर रो रहे थे। 

गोंडा जेल में फांसी के दिन कुछ घण्टे पूर्व राजेंद्र नाथ लाहिड़ी जी 
दोस्तों फाँसी के दिन भी सुबह - सुबह लाहिड़ी जी व्यायाम कर रहे थे। जेलर ने पूछा कि मरने के पहले व्यायाम का क्या प्रयोजन है? लाहिड़ी ने निर्वेद भाव से उत्तर दिया - "जेलर साब! चूँकि मैं हिन्दू हूँ और पुनर्जन्म में मेरी अटूट आस्था है, अतः अगले जन्म में मैं स्वस्थ शरीर के साथ ही पैदा होना चाहता हूँ ताकि अपने अधूरे कार्यों को पूरा कर देश को स्वतन्त्र करा सकूँ। इसीलिए मैं रोज सुबह व्यायाम करता हूँ। आज मेरे जीवन का सर्वाधिक गौरवशाली दिवस है तो यह क्रम मैं कैसे तोड़ सकता हूँ?" 

कसम से ऐसे वीरों की धरती को करोड़ो बार नमन, करोडो बार नमन, करोडो बार नमन......


नितीश श्रीवास्तव
कायस्थ की कलम से
तो मित्रों ये थी हमारे स्वतंत्रता सेनानियों से जुडी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी, जिसे मैंने आपसे साझा की। ऐसे ही रोचक और महत्वपूर्ण जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट पर निरंतर आते रहे और अपने दोस्तों ,परिवार वालों और सभी प्रियजनों तक भी ये महत्वपूर्ण जानकारी पहुचायें। धन्यवाद।


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