Thursday, May 7, 2020

हिंदू से हिंदू को तोड़ने के लिए आखिर क्यों भ्रम फैला रहें है लोग पूरी सच्चाई खुद जाने :: The Hindu Unity

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हिंदू से हिंदू को तोड़ने के लिए आखिर क्यों भ्रम फैला रहें है लोग पूरी सच्चाई खुद जाने 

दोस्तों हिन्दू धर्म को चार वर्णों में बांटा गया ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य, शुद्र । सभी के अलग अलग कार्य थे , कार्य प्रधानता ही वर्णो को वर्गीकृत करती थी, दोस्तों ये बात आप फिर से समझ लीजिये की लोगों की कार्य प्रधानता ही उनका वर्ण निर्धारित करती थी बल्कि कोई जाती नहीं, लेकिन आज देखता हूं तो लगता है कि हिंदुओं के एक समाज मे खास ज़हर घोला गया, कि तुम्हे प्रताड़ित किया गया है वर्षो से वो यातनाये झेलते चले आ रहे है एक बार तो मेरे मित्र जो हमारे साथ चाय पी रहे थे, बोलने लगे हम बहुत प्रताड़ित किये गए है वर्षों से ये चला आरहा है तो मैंने उनसे पूछा किसने प्रताड़ित किया तो बोले सवर्णो ने मैंने कहा मैं भी तो सवर्ण हु तो मैं कहाँ तुम्हे प्रताड़ित कर रहा वो बोले, अभी नही बहुत सालों पहले से प्रताड़ित होते आ रहे हैं। मैंने कहा बताओ कब-कब या कहाँ तो वो बता न सके। मैंने कहा पहले जानो की सत्य क्या है?

जिस पुरातन काल की वो बात कर रहे थे। अगर गौर करें तो अंग्रेजो ने लगभग 250 साल इस देश पर राज किया और मुगलों ने 450 साल, दोनों मिलकर लगभग हो गये 700 साल औऱ जिस प्रताड़ना की वो बात करते है वो उतनी पुरानी तो नही होगी, होगी भी तो सिर्फ 100, 200 साल की अब उनसे कोई कहे कि जब यह दुसरो का शासन था तो सवर्ण प्रताड़ित कैसे करेगा, सभी को पता है अंग्रेजो के वक़्त सबसे ज्यादा जुल्म मजदूरों और किसानों पर हुए जो आर्थिक रूप से कमजोर थे ,अच्छे ओहदे वाले हमेशा अपने से नीचे वालो का शोषण करते आये है। यही शायद अंग्रेजो के वक़्त भी हुआ होगा, लेकिन इतिहास कारों ने हिन्दुओ को तोड़ने के लिए ये सारा भ्रम फैलाया। 
अगर हम बात करें उस मनुस्मृति की जिसका आज लोग बिना जाने हवाला देते है, उसके अनुसार हर व्यक्ति की पहचान उसका कर्म है यानी जो व्यक्ति जैसा काम करेगा वो उस वर्ण का कहलायेगा 

एक वर्ण से दूसरे वर्ण में – मनुस्मृति के नौवें चेप्टर के एक श्लोक पर गौर करें।

शुचिरुत्कृष्टशुश्रूषूर्मृदुवागनहंकृत: |
ब्राह्मणद्याश्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्नुते || 9/335 ||


भावार्थ – शुद्ध-पवित्र, अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, सदा ब्राह्मण आदि तीनों वर्णों की सेवा में संलग्न शूद्र भी उत्तम ब्रह्मजन्म* के अतंर्गत दूसरे वर्ण को प्राप्त कर लेता है.

* ब्रह्मजन्म से अभिप्राय शिक्षित होने से है. शिक्षित होने को दूसरा जन्म भी कहा गया है। 
उपरोक्त श्लोक से बात कुछ समझ में आती है. इसे और समझने के लिए एक अन्य श्लोक देखें. यह श्लोक ऋग्वेद से है. (ऋग्वेद का श्लोक इसलिए क्योंकि मनु की बातें वेदों में निहित हैं)

ब्राह्मण: क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातय: |
चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पंचम: || 10/4 ||


भावार्थ – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ये तीन वर्ण विद्याध्‍ययन रूपी दूसरा जन्म प्राप्त करने वाले हैं, अत: द्विज कहलाते हैं. चौथा विद्याध्‍ययन रूपी दूसरा जन्म (द्विजजन्म) न होने के कारण एकजाति या एक जन्म वाला ब्रह्मजन्म से रहित शूद्र वर्ण है. पांचवां कोई वर्ण नहीं है। 

इन दो श्लोकों से बहुत साफ होता है कि ज्ञान प्राप्त करना (पढ़ना-लिखना) दूसरा जन्म है. दूसरा जन्म नहीं पाने वाला अर्थात जो पढ़ता-लिखता नहीं है, ज्ञान अर्जित नहीं कर पाता है, वह शूद्र है. बहुत सरल-सी बात है. जो ज्ञान अर्जित कर पाने में अक्षम हैं वे शूद्र हैं. ऐसा नहीं है कि शूद्र, ज्ञान अर्जित नहीं कर सकते. मनु के श्लोक से साफ है कि यदि सेवा में लगा शूद्र ब्रह्मजन्म ले ले, मतलब पढ़ लिखकर ज्ञान हासिल कर ले, तो वह दूसरे वर्ण का अधिकारी हो सकता है। 

मनु का एक श्लोक और, जो दूध को दूध साबित कर देता है, पानी छंटकर अलग हो जाता है –

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् |
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च || 10/65 ||


भावार्थ – शूद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शूद्र हो सकता है अर्थात गुणकर्मों के अनुकूल ब्राह्मण हो तो ब्राह्मण रहता है तथा जो ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के गुण वाला हो तो वह क्षत्रिय वैश्य और शूद्र हो जाता है. वैसे शूद्र भी मूर्ख हो तो वह शूद्र रहता है और उत्तम गुणयुक्त हो तो यथायोग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, और वैश्य हो जाता है. वैसे ही क्षत्रिय और वैश्य के विषय में भी जान लेना. (इस श्लोक में बहुत क्लीयर लिखा है कि यदि गुण ब्राह्मण के हैं तो व्यक्ति ब्राह्मण है, नहीं तो अपने गुणों के अनुसार वह क्षत्रिय, वैश्य, या शूद्र हो जाता है।

हमारे यहां जो पौराणिक कथाएं है उनको भी देखे तो कभी यह नही कहा गया कि ब्राह्मण का पुत्र ब्राह्मण ही होगा या शूद्र एक पुत्र शुद्र जैसे महाभारत के रचयिता वेदव्यास जी एक शुद्र पुत्र थे लेकिन उन्हें ब्राह्मण माना गया उनके लिए शास्त्र आज भी पूजनीय है उसी तरह महर्षि वाल्मीकि कहा जाता है ये भी उसी कुल के थे लेकिन रामायण लिखी वो भी संस्कृत में और जो कि पूजनीय है ,इनका दर्जा भी ब्राह्मणों में ही गिना जाता है ,उसी प्रकार महर्षि विस्वामित्र को शस्त्र ज्ञान था तो ये क्षत्रिय कहे जाने लगे गुरु द्रोण जो कि ब्राह्मण थे क्षत्रिय ही माने गए और युद्ध लड़े।और सबसे बड़ा उदाहरण रावण ब्राह्मण परिवार में पैदा होकर भी उझमे राक्षसी प्रवृत्तियां थी तो वो राक्षस कहा गया ।सुकदेव जी जिनका वर्णन अक्सर हिन्दू कथाओं मे मिलता है व्यास जी के पुत्र कहे जाते है जो कि शुद्र थे।
ऐसे न जाने कितने ही उदाहरण है जो अपने कर्म प्रधानता के कारण इनका वर्ण बदल गया मतलब यह कि वर्ण व्ययवस्था में ऐसा कही नही दिया गया कि जन्म ही वर्ण का उत्तराधिकारी हो

अब आते है सामरिक समय मे, यहाँ पूंछा जाता है आप किस जाति के है ?
इस संविधानिक समय में आपका जन्म निर्धारण करेगा कि आप किस जाति के है ये मैं नही हमारा संविधान कहता है जो जिस जाति में पैदा होगा वो उसी जाति का होगा लेकिन इस पर किसी की निगाह नही जाती ।

मनुस्मृति को पानी पी पी कर गाली देने वाले भी जाने अनजाने में मनु स्मृति का ही पालन करते है कैसे ये मैं बताता हूं , हमारे दलित भाई लोग कहते है कि हमे उपेक्षित किया गया लेकिन वो ये बताए जब उनमे से कोई एक जब पढ़ लिख कर ऊंचे ओहदे पर पहुच जाता है तो उसकी भी गिनती बड़े लोगो मे होती है और वो अपने से कम पड़े लिखे लोगो को कम में आंकता है। उनके साथ अच्छा व्यवहार नही करता न ही उनका साथ देता है मैं ये नही कह रहा कि ये सिर्फ निचली जातियों में होता है सवर्णो में भी होता है जब उनमे से कोई अच्छे ओहदे पे नही होता तो वो भी अपने ही लोगो द्वारा उपेक्षा का शिकार होता है मतलब साफ है। यहां पर भी वही बात है जो जैसा होगा उसका सम्मान वैसा ही होगा ये नितांत सत्य है ये कोई हिन्दू परंपरा नही हमारी प्रकृति ही ऐसी है छोटा ही बड़े की उपेक्षा का शिकार होगा। जैसे भीमराव अम्बेडकर , ज्योतिबा फुले जैसे लोगों का ओहदा अलग है क्यों कि इन लोगो ने अपना मुकाम अलग बनाया इन्हें कौन उपेक्षित कर सकता है और मेरे हिसाब से ये जो ज़हर घोल गया है इसकी सत्यता को समझे, सच पहचाने अब वो माहौल नही की ऊंच नीच की भावना हो सब बराबर है बस शिक्षा सबसे जरूरी है आपको अलग पहचान दिलाने के लिए इसी लिए सब को शिक्षित किया जाए बिना किसी भेद भाव के। 
नितीश श्रीवास्तव
कायस्थ की कलम से

तो मित्रों ये थी हमारे समाज में फैली बुराइयों से निपटने से सम्बंधित एक विशेष वर्णन जिसकी जानकारी, मैंने आपसे साझा की। येसे ही रोचक और महत्वपूर्ण जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट पर निरंतर आते रहे और अपने दोस्तों ,परिवार वालों और सभी प्रियजनों तक भी ये महत्वपूर्ण जानकारी पहुचायें। धन्यवाद। 


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